Unlocking the Secrets of Pitra Dosh as per Astrology

Discover the profound insights of Lal Kitab astrology and Vastu Shastra. Research Astrologer Pawan Kumar Verma, Gold medalist and Expert, shares his extensive 30 years of research and knowledge in these articles with you, sharing the divine sciences, offering remedies and guidance for a harmonious life through astrology and lucky stones.

Research Astrologer Pawan Kumar Verma

5/6/20261 min read

ज्योतिष शास्त्र (वैदिक) में पित्रादि-दोष (ऋण) या श्राप की सही पहचान और निदान।

"पित्र-श्राप" का सही पता सिर्फ जन्म कुण्डली देखकर ही नहीं लगाया जा सकता है, अपितु कुंंडली ना होने पर इसके अलावा प्रश्न कुंडली, हस्त-रेखा (सामुद्रिक विज्ञान), अपराविज्ञान और शकुन शास्त्र के माध्यम से भी "पित्र दोष" का सही पता लगाया जा सकता है, परन्तु प्राय ये विधिंयाँ प्रचलन में नहीं है लुप्तप्राय सी हो गयी हैं। मुख्य रूप से जन्म कुण्डली से ही पित्र दोष का निर्णय किया जाता है।

                ||चार प्रकार के प्रवल पित्र-दोष ||

सूर्य.... आत्मा एवं पिता का कारक गृह है पित्र पक्ष का विचार सूर्य से होता है।

"चन्द्रमा" मन एवं माता पक्ष का कारक ग्रह है।

मंगल... हमारे रक्त , जीन्स, परम्परा, पौरुष और बंधुत्व पक्ष का कारक ग्रह है।

शुक्र.... भी हमारे भोग, ऐश्वर्य और स्त्री पक्ष का कारक ग्रह है।

सूर्य जब राहु- की युति में हो तो ग्रहण योग बनता है, सूर्य का ग्रहण अतः पिता या आत्मा का ग्रहण हुआ यानि पित्र-श्राप या श्रापित आत्मा। और चंद्र केतु की युति, अमावस्या दोष या चंद्र ग्रहण दोष भी एक प्रकार का पित्र दोष ही होता है

             || चार अत्यंत कष्टकर पित्र-दोष  ||

"सूर्य"---- सूर्य राहू सूर्य शनी या सूर्य केतु की युति पित्र दोष का निर्माण करती है।

"चन्द्र"--- अगर राहू, केतुु , शनी या सूर्य की युति ग्रहण में हो तो पित्र दोष (मातृ पक्ष) होता है।

"मंगल"--- भी यदि पूर्णास्त है या इन क्रूर ग्रहों से युक्त है तो भी वंशानुगत पित्र दोष होता है।

"शुक्र"--- या सप्तम भाव यदि सूर्य, मंगल, शनी या राहु से युक्त हो तो भी स्त्री पक्ष से पित्र श्राप बनता है।

वैसे समस्त ग्रहों के दूषित होने से कुंंडली में विभिन्न प्रकार के अन्य पित्रादि श्राप भी बन सकते हैं.... परंतु अभी हम कुछ प्रमुख पित्र दोषों (श्रापों) को समझने की कोशिश करते हैं :-

शनि सूर्य पुत्र है, यह सूर्य का नैसर्गिक शत्रु भी है, अतः शनि की सूर्य पर दर्ष्टि भी पित्र दोष उत्पन करती है। इसी पित्र दोष से जातक आदि-व्याधि-उपाधि तीनो प्रकार की पीड़ाओं से कष्ट उठाता है, उसके प्रत्येक कार्ये में अड़चनें आती रहती हैं, कोई भी कार्य सामान्य रूप से निर्विघ्न सम्पन्न नहीं होते है, दूसरे की दृष्टि में जातक सुखी-सम्पंन दिखाई तो पड़ता है, परन्तु जातक आंतरिक रूप से दुखी होता रहता है, जीवन में अनेक प्रकार के कष्ट उठाता है, कष्ट किस प्रकार के होते है इसका विचार व निर्णय सूर्य राहु की युति अथवा सूर्य शनि की दृष्टि सम्बन्ध या युति जिस भाव में हो उसी पर निर्भर करता है, कुंडली में चतुर्थ भाव नवम भाव, तथा दशम भाव में सूर्य राहु अथवा चन्द्र राहु की युति से जो पित्र दोष उतपन्न होता उसे श्रापित पितृ दोष कहते है, इसी प्रकार पंचम भाव में राहु गुरु की युति से बना गुरु चांडाल योग भी प्रबल पितृ दोष कारक होता होता है, संतान भाव में इस दोष के कारण प्रसव कष्टकारक होते हैं, आठवे या बारहवे भाव में स्थित गुरु प्रेतात्मा से पित्र दोष करता है, यदि इन भावो में राहु बुध की युति में हो तथा सप्तम, अष्टम भाव में राहु और शुक्र की युति में हो तब भी पूर्वजो के दोष से पित्र दोष होता है, यदि राहु शुक्र की युति द्वादश भाव में हो तो पित्र दोष स्त्री जातक से होता है इसका कारण भी स्पष्ट कर दें क्योंकि बारहवाँ भाव भोग एव शैया सुख का स्थान है, अतः इस भावके दूषित होने से स्त्री जातक से दोष (श्राप) होना स्वभाविक है ये अनैतिक संबंधों का कारण भी हो सकता है।

अन्य श्रापित योग :- 

  • अगर कुण्डली में अष्टमेश राहु के नक्षत्र में तथा राहु अष्टमेश के नक्षत्र में स्थित हो तथा लग्नेश निर्वल एवं पीड़ित हो तो जातक पित्र दोष एव भूत प्रेतादि आदि से शीघ्र प्रभावित होते हैं।

  • अगर जातक का जन्म सूर्य चन्द्र ग्रहण में हो तथा घटित होने वाले ग्रहण का सम्बन्ध जातक के लग्न, षष्ट एव अष्टम भाव से बन रहा हो तो ऐसे जातक पित्र दोष,भूत प्रेत, एव आत्माओं के प्रभाव से पीड़ित रहते हैं।

  • अगर लग्नेश जन्म कुण्डली में अथवा नवमांश कुण्डली में अपनी नीच राशि में स्थित हो तथा राहु , शनि, मंगल के प्रभाव से युक्त हो तो जातक पित्र दोष, प्रेत्माओं का शिकार होता है।

  • अगर जन्म कुण्डली में अष्टमेश पंचम भाव तथा पंचमेश अष्टम भाव में स्थित हो तथा चतुर्थेश षष्ठ भाव में स्थित हो और लग्न या लग्नेश पापकर्तरी (प्रतिबंधक) योग में स्थित हो तो जातक मातृ श्राप एवं अतृप्त मात्र आत्माओं से प्रभावित होता है।

  • अगर चन्द्रमा जन्म कुण्डली अथवा नवमांश कुण्डली में अपनी नीच राशि में स्थित हो या चन्द्र एव लग्नेश का सम्बन्ध क्रूर एव पाप ग्रहो से बन रहा हो तो जातक पित्र दोष, प्रेत-वाधा, एवं पित्रात्माओं से प्रभावित होता है।

  • अगर कुंडली में शनि एव चन्द्रमा की युति हो अथवा चन्द्रमा शनि के नक्षत्र में, अथवा शनि चन्द्रमा के नक्षत्र में स्थित हो तो जातक पित्र दोष, एव अतृप्त आत्माओं से शीघ्र प्रभावित होता है।

  • अगर लग्नेश जन्म कुंडली में अपनी शत्रु राशि में निर्बल आव दूषित होकर स्थित हो तथा क्रूर एव पाप ग्रहो से युक्त हो तथा शुभ ग्रहो की दृष्टि लग्न भाव एव लग्नेश पर नहीं पड़ रही हो, तो जातक प्रेतात्माओं, एव पित्र दोष से पीड़ित होता है।

  • अगर जातक का जन्म कृष्ण पक्ष की अष्टमी से शुक्ल पक्ष की सप्तमी के मध्य हुआ हो और चन्द्रमा अस्त, निर्बल, एव दूषित हो, अथवा चन्द्रमा पक्षबल में निर्बल हो, तथा राहु शनि से युक्त नक्षत्र परिवर्तन योग बना रहा हो तो श्राप के कारण जातक अदृश्य रूप से मानसिक बाधाऔं का शिकार होता है।

  • अगर कुंडली में चन्द्रमा राहु के नक्षत्र में स्थित हो तथा अन्य क्रूर एव पाप ग्रहो का प्रभाव चन्द्रमा, लग्नेश, एव लग्न भाव पर हो तो जातक अतृप्त आत्माओं से प्रभावित होता है।

  • अगर कुंडली में गुरु का सम्बन्ध राहु से हो तथा लग्नेश एव लग्न भाव पापकर्तरी योग में हो तो जातक को अतृप्त आत्माए अधिक परेशान करती है ।

  • अगर बुध एव राहु में नक्षत्रीय परिवर्तन हो तथा लग्नेश निर्बल होकर अष्टम भाव में स्थित हो साथ ही लग्न एव लग्नेश पर क्रूर एव पाप ग्रहो का प्रभाव हो तो जातक अतृप्त आत्माओं से परेशान रहता है और मनोरोगी बन जाता है।

  • अगर कुंडली में अष्टमेश लग्न में स्थित हो (मेष लग्न को छोडकर अन्य लग्नों में) तथा लग्न भाव तथा लग्नेश पर अन्य क्रूर तथा पाप ग्रहो का प्रभाव हो तो जातक अतृपत आत्माओं का शिकार होता है

  • अगर जन्म कुण्डली में राहु जिस राशि में स्थित हो उसका स्वामी निर्बल एव पीड़ित होकर अष्टम भाव में स्थित हो तथा लग्न एव लग्नेश पापकर्तरी योग में स्थित हो तो जातक ऊपरी हवा, प्रेत बाधित और आत्माओं से परेशान रहता है ।

ऐसे और भी बहुत से ग्रह योग जन्म कुंडली में होते हैं जिन्हें गहराई से अध्ययन अवलोकन करने पर बहुत कुछ जाना जा सकता है

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सिर्फ इतना ही नहीं और भी दूषित ग्रहों से पित्र-ऋण (श्राप) दोष भी बनते हैं जो जीवन में बहुत ही अवरोध पैदा करके नाना प्रकार के कष्ट देते हैं :-

जैसे:-

               पित्र दोष(श्राप) के कारण व प्रकार

1- "सूर्य" से पिता, चाचा, ताऊ, दादा, परदादा, नाना, मामा, मौसा या समतुल्य पैत्रिक (पित्रपुरुस) ऋण (श्राप)।

2-"चंद्र" से मातृ, मातृ पक्ष या मात्तुल्य स्त्रियों के ऋण (श्राप)।

3-"मंगल" से भाई, मित्र, स्नेही या इनके समान पित्रों का ऋण (श्राप)।

4-"बुध" से बहन-भांजी बुआ, साली, ननद या समतुल्य का ऋण (श्राप)।

5-"गुरू" से गुरुदेव, ब्राह्मण, महात्मा, ज्ञानीजन, शिक्षक, विद्वान, पंडित या कुल पूज्य पुरुस आदि का ऋण (श्राप)।

6-"शुक्र" से पत्नी, प्रेमिका अथवा शैया सुख देने वाली अन्य स्त्रियों का ऋण (श्राप)।।

7-"शनी" से सेवक, कर्मचारी, मातहत, वेटर, मजदूर, मिश्त्री, चांडाल (डोम), भिकारी, या दीन-दुखियों का ऋण (श्राप)।।

8-"राहु-केतु" से प्राकृतिक, पर्यावरण, सामाजिक, क्षेत्रपाल, देश, मात्रभूमी, सरकारी अधिकारी, कर चोरी, जाने-अन्जाने की गई हिंसा, जीवहत्या या अनैतिक व्यवहार व व्यापार के अभिश्राप (ऋण)।।

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हस्त-रेखा से भी:-

भिन्न-भिन्न ग्रह पर्वतों के योग एवं पर्वतों पर पाऐ जाने वाले चिन्ह जैसे:- क्रोस, जाल, द्वीप, वलय, भंग, दाग (तिलादि), झाँई, या अन्य अशुभ चिन्हों से भी सभी प्रकार के पित्रादि दोषों (श्रापों) बीमारी को सहजता से जाना जा सकता है।

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पितृ दोष (श्राप) भी भांति भांति के पाऐ जाते हैं, इन्ही पित्रादि दोषो के कारण जातक को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, और शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक, अकस्मात दुर्घटनाओं से परेशान रहता है, और शनै-शनै जातक का जीवन नर्क बनता जाता है, एवं कई बार तो दिखने में सम्पंन व्यक्ती भी आंतरिक तौर से पीडित होकर मृतकों जैसा जीवन जीने पर मजबूर हो सकता है और दोष की सही जानकारी ना होने पर श्रापमुक्ती के लिऐ दर-दर भटकता रहता है व तमाम तंत्र, मंत्र, रत्न , व्रत, जाप या उपाय करके भी पीडित दुःखी रहता है उसको कोई लाभ नहीं होता अन्ततः वैदिक तंत्र-ज्योतिषादि को ही ढ़ोंग मान बैठता है।।

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तब करें क्या:-

एक बात ध्यान दें कि मौत के बिना हर बीमारी का इलाज है मगर मौत का कोई ईलाज नहीं हर एक श्राप, दोष, दुर्भाग्य, और पाप का प्रायश्चित कर्म-विधान व उसको करने का सही स्थान और मुहुर्त भी हमारे वैदिक शास्त्रों में बताया है एवं अत्यंत फलदायी भी होता है ये अकाट्य सत्य है वर्तमान कर्मों से ... भविष्य का लेख भी बदल सकता है।।

अतः जिस तरह पित्रादि-दोष (श्राप) या ऋण कई प्रकार के होते हैं..... उसी तरह इनके निदान (प्रायश्चित कर्म-विधान) भी देश, काल, परिस्थितियों के आधीन होकर विभिन्न तरीके से ही कराना उचित होता है।

इसलिऐ सर्वप्रथम जातक को... इस विषय के विषेशज्ञ व तत्वज्ञ ज्योतिषाचार्य से उचित परामर्श लेना चाहिये और तत्पश्चात उसके द्वारा बताऐ गये " मुहुर्त" में ..... पूर्ण श्रद्धा और समर्पण भाव से इन श्रापों (दोषों) का प्रायश्चित कर्म-विधान करवाना चाहिऐ.... तथा आचार्यों द्वारा बताऐ गये नियम-संयमों का पूर्ण विश्वास से पालन करना करें... फिर आप देखेंगे ये दोष भी आपकी उन्नती में मील के पत्थर बन जायेंगे... शुभास्तु।।

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Research Astrologer Pawan Kumar Verma (B.A.,D.P.I.,LL.B.)

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